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कुर्सी छोड़ जमीन पर बैठे संवेदनशील एसडीएम मिश्रा

सागर

​कलेक्ट्रेट का वो गलियारा, जहाँ अमूमन फाइलों का अंबार और दफ्तरों की औपचारिकताएं हावी रहती हैं, मंगलवार दोपहर ठीक 12 बजे एक ऐसे मानवीय स्पर्श का गवाह बना जिसने व्यवस्था के प्रति आम जन के विश्वास को और गहरा कर दिया। यह दृश्य किसी फिल्म का हिस्सा नहीं, बल्कि कर्तव्य और संवेदना के संगम की एक जीती-जागती तस्वीर थी।
​जब जनसुनवाई अपने पूरे शबाब पर थी, तभी संत कंवरराम वार्ड निवासी अनिल कुमार लहरवानी अपनी टूटी उम्मीदों और खराब हो चुकी मोटर ट्राइसाइकिल की समस्या लेकर वहां पहुंचे। दोनों पैरों से लाचार अनिल के चेहरे पर लाचारी और पिछले 15 दिनों से एक ही जगह कैद रहने की पीड़ा साफ झलक रही थी। भीड़भाड़ और अफसरों की व्यस्तता के बीच अनिल अपनी बात कहने की कोशिश कर ही रहे थे कि तभी एसडीएम अमन मिश्रा की नजर उन पर पड़ी।
​फिर जो हुआ, उसने वहां मौजूद हर शख्स का दिल जीत लिया। एसडीएम अमन मिश्रा ने अपनी पद की गरिमा और कुर्सी के मोह को एक तरफ रखा और खुद चलकर उस दिव्यांग फरियादी के पास पहुंचे। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के संगमरमर के फर्श पर बैठकर अनिल के पास अपनी जगह बनाई। जमीन पर बैठकर दिव्यांग की आंखों में आंखें डाल कर उनकी समस्या सुनना, प्रशासन के उस चेहरे को दर्शाता है जिसकी कल्पना अक्सर लोग लोकतंत्र में करते हैं।
​अनिल ने रुंधे गले से बताया कि 13 सितंबर 2024 को मिली उनकी मोटर ट्राइसाइकिल अब पूरी तरह जवाब दे चुकी है। आने-जाने का सहारा छिन जाने से उनका जीवन एक कमरे में सिमट कर रह गया था। नियम और कायदे अपनी जगह थे—अधिकारियों ने बताया कि मोटर ट्राइसाइकिल तो 22 साल में एक बार ही मिलती है। लेकिन एसडीएम की संवेदनशीलता नियमों की पेचीदगियों से कहीं ऊपर थी।
​उन्होंने तत्काल मौके पर संबंधित विभाग को निर्देशित किया कि इस वाहन को तुरंत सुधारा जाए। साथ ही, जब तक मोटर ट्राइसाइकिल ठीक नहीं होती, तब तक अनिल की गतिशीलता न रुके, इसके लिए उन्होंने हाथ से चलने वाली ट्राइसाइकिल अस्थायी रूप से उपलब्ध कराने का भरोसा दिलाया।
​एसडीएम का यह सादगी भरा व्यवहार और ‘जमीन पर बैठकर’ फरियाद सुनना केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि मानवता की एक मिसाल बन गया। जनसुनवाई में मौजूद हर व्यक्ति इस दृश्य को देखकर भावुक था और चर्चा कर रहा था कि अगर हर अधिकारी इसी तरह की संवेदनशीलता दिखाए, तो कोई भी फरियादी कभी निराश होकर नहीं लौटेगा। यह घटना हमें याद दिलाती है कि पद हमें शक्ति जरूर देते हैं, लेकिन इंसानियत हमें ‘लोकसेवक’ बनाती है।

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